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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 3, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 3, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । तस्यैवंप्रायया तत्र ततयोदारचिन्तया । सा व्यतीयाय रजनी पद्मस्येवार्ककाङ्क्षिणः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

[नन शास्त्राभ्यास और सज्जनों के अनुग्रह से पीछे उत्पन्न होने के कारण सन्मति को पुत्री कहा । तीसरा सर्ग प्रातःकाल स्नानगृह में आये हुए श्रीरामचन्द्रजी आदि के साथ श्रीवसिष्ठजी का सभा-गृह में जाना और सभा का आरम्भ | श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे वत्स, जैसे सूर्योदय की आकांक्षा करनेवाले कमल की रात्रि व्यतीत होती है, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी की वह रात्रि इस प्रकार की विस्तृत ज्ञानविषयक चिन्ता से व्यतीत हुई

सर्ग सन्दर्भ

दूसरा सर्ग समाप्त ॐ जीव और बुद्धि एक अविद्या के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए बुद्धि को भगिनी कहा और अपने को भाई कहा ।