Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verses 37–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 20, verses 37–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 37-41
संस्कृत श्लोक
भावाभावविनिर्मुक्तं जरामरणवर्जितम् ।
संस्मरात्मानमव्यग्रो मा विमूढमना भव ॥ ३७ ॥
न ते दुःखं न ते जन्म न ते माता न ते पिता ।
आत्मैवासि न सद्बुद्धे त्वमन्यः कश्चिदेव हि ॥ ३८ ॥
अस्यां संसारयात्रायां नानाभिनयदायिनः ।
अज्ञा एव नराः साधुरसभावसमन्विताः ॥ ३९ ॥
मध्यस्थदृष्टयः स्वस्था यथाप्राप्तार्थदर्शिनः ।
तज्ज्ञास्तु प्रेक्षका एव साक्षिधर्मे व्यवस्थिताः ॥ ४० ॥
कर्तारोऽपि न कर्तारो यथा दीपा निशागमे ।
आलोककर्मणामेवं तज्ज्ञा लोकस्थिताविह ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थित हैँ । जैसे दीपक रात्रि आने पर प्रकाशन क्रिया में सन्निधिमात्र से कर्ता होते हुए भी व्यापार न करने
के कारण अकर्ता ही हैं, वैसे ही यहाँ तत्त्वज्ञानी पुरुष लोकव्यवहार स्थिति में कर्ता होते हुए भी अकर्ता
ही है