Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 20, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
कस्ते पिता कश्च सुहृत्का माता कश्च वा परः ।
खस्यानन्तविलासस्य किमस्वं किं स्वमुच्यताम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार पिता आदि का शरीर भी भ्रान्ति से अतिरिक्त कुछ भी नहीं ठहरता, यह कहते हैं।
कोन तुम्हारी माता हे, कौन तुम्हारे पिता हैं, कौन मित्र है अथवा कौन शत्रु हे । जरा बतलाओ तो
सही, अनन्त विलासवाले चिदाकाश का कोन स्वभिन्न है ओर कौन स्व है ? भाव यह है कि यदि देहादि
उपाधि से पृथक् किया गया चिदाकाश ही मैं, तुम और पिता आदि हैं, ऐसा समझते हो, तो “मेरे पिता,
मेरा भाई" इत्यादि भेदयुक्त स्वत्व आदि सम्बन्ध नहीं घट सकता