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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verses 15–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 21, verses 15–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 15-26

संस्कृत श्लोक

वैराग्यात्पूर्णतामेति मनो नाशावशानुगम् । आशया रिक्ततामेति शरदेव सरोमलम् ॥ १५ ॥ हृदयं शून्यतामेति प्रकटीकृतकोटरम् । अगस्तिपीतार्णववदाशाविवशचेतसाम् ॥ १६ ॥ यस्य चित्ततरौ स्फारे तृष्णाचपलमर्कटी । न वल्गति महत्तस्य राजते हृद्वनं ततम् ॥ १७ ॥ पद्माक्षकोशं त्रिजगद्गोष्पदं योजनव्रजम् । निमेषार्धं महाकल्पः स्पृहारहितचेतसाम् ॥ १८ ॥ शीतता सा न शीतांशोर्न हिमाचलकन्दरे । न रम्भाचन्दनावल्यां निःस्पृहेषु मनःसु या ॥ १९ ॥ न तथा भाति पूर्णेन्दुर्न पूर्णः क्षीरसागरः । न लक्ष्मीवदनं कान्तं स्पृहाहीनं यथा मनः ॥ २० ॥ यथाब्दलेखा शशिनं सुधालेपं मषी यथा । दूषयत्येवमेवान्तर्नरमाशापिशाचिका ॥ २१ ॥ आशाख्याश्चित्तवृक्षस्य शाखाः स्थगितदिक्तटाः । तासु च्छिन्नास्वरूपत्वं याति चित्तमहाद्रुमः ॥ २२ ॥ छिन्नतृष्णामहाशाखे चित्तस्थाणौ स्थितिं गते । एकरूपतया धैर्यं प्रयाति शतशाखताम् ॥ २३ ॥ अनस्तमितधैर्येण तेन चित्ते क्षयं गते । तत्पदं प्राप्यते राम यत्र नाशो न विद्यते ॥ २४ ॥ एतासां चित्तवृत्तीनामाशानामुत्तमाशयः । न ददासि प्ररोहं चेत्तद्भयं नास्ति राघव ॥ २५ ॥ चित्तं वृत्तिविहीनं ते यदा यातमचित्तताम् । तदा मोक्षमयीमन्तः सत्तामाप्नोषि तां तताम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्तरूपी ढूँठ के रहने पर बढने में रुकावट डालनेवाले कुवृक्ष के कट जाने के बाद उसके नीचे उगे हुए उस वृक्ष के समान धैर्य सैकड़ों शाखाओंवाला हो जाता है हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्त के क्षीण होने पर बढ़े हुए वैराम्य, जितेन्द्रियता, द्रन्द्र सहिष्णुता आदि धेर्यवाला पुरुष उस परम पद को प्राप्त होता है, जहाँ पर फिर नाश नहीं है। हे श्रीरामचन्द्रजी, उत्तम आशयवाले आप यदि चित्तवृत्तिरूपी इन आशाओं को पुनः पनपने के लिए अवसर नहीं देंगे, तो आपको जन्म आदिका कोई भय नहीं हे । वृत्तिरहित आपका चित्त भी अचित्तता को प्राप्त हुआ हो, तभी आप अपने अन्दर मोक्षमयी उस पूर्ण सत्ता को प्राप्त होते हे