Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 21, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

पूर्णे मनसि संपूर्णं जगत्सर्वं सुधाद्रवैः । उपानद्रूढपादस्य ननु चर्मास्तृतैव भूः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि सन्ताप के कारणभूत आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, रोग, वर्षा, धूप, चोर, सर्प आदि के रहते कैसे मन की एक मात्र शान्ति से सब सन्तापो की निवृत्ति हो सकती है ? इस पर कहते हैं। मन के पूर्ण होने पर सारा जगत सुधारस से पूर्ण हो जाता है, जिसके पैर जूते से ढके हुए रहते हैं, उसके लिए सारी भूमि चमड़े से ढकी हुई ही है । भाव यह है कि आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक भेद से तीनों प्रकार के सन्तापो की जड़ मनोदोष ही है। मन के विशुद्ध ब्रह्मामृतरस से पूर्ण होने पर सारा जगत आनन्दपूर्ण ही प्रतीत होता है । जैसे कि मुलायम जूतों से जिसका पैर सुरक्षित है, उसे कुश और कोटो से भरी हुई सारी पृथिवी भी मुलायम चमड़े से ढकी हुई ही प्रतीत होती है