Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verses 8–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 21, verses 8–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 8-13
संस्कृत श्लोक
एषा ब्राह्मी स्थितिः स्वच्छा निष्कामा विगतामया ।
एनां प्राप्य महाबाहो विमूढोऽपि न मुह्यति ॥ ८ ॥
एकं विवेकं सुहृदमेकां प्रौढसखीं धियम् ।
आदाय विहरन्नेव संकटेषु न मुह्यति ॥ ९ ॥
विनिवारितसर्वार्थादपहस्तितबान्धवात् ।
न स्वधैर्यादृते कश्चिदभ्युद्धरति संकटात् ॥ १० ॥
वैराग्येणाथ शास्त्रेण महत्त्वादिगुणैरपि ।
यत्नेनापद्विघातार्थं स्वयमेवोन्नयेन्मनः ॥ ११ ॥
न तत्त्रिभुवनैश्वर्यान्न कोशाद्रत्नधारिणः ।
फलमासाद्यते चित्ताद्यन्महत्त्वोपबृंहितात् ॥ १२ ॥
तदेतस्मिञ्जगत्कुक्षौ पातोत्पातनदोलनैः ।
पतन्ति पुरुषा ये वै मनस्तेषां गतज्वरम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महाबाहो, यह स्वच्छ,
कामनारहित, निर्दोष ब्राह्मी स्थिति है, इसे प्राप्तकर व्यवहार मेँ अकुशल पुरुष भी मोह को प्राप्त नहीं
होता | केवल एक विवेकरूपी मित्र को एवं एकमात्र बुद्धिरूपी प्रिय सखी को लेकर विहार कर रहा पुरुष
संकटों में मोह को प्राप्त नहीं होता जिसने सब धनसम्पत्तियों का त्याग कर दिया ओर भीतर स्नेह न
रहने के कारण अपने बन्धु-बान्धवों को मानों गलहस्त देकर निकाल दिया, ऐसे अपने विवेक के सिवाय
संकट से कोई उद्धार नहीं कर सकता । वैराग्य से, शास्त्र से अथवा महत्त्व आदि गुणों से बड़े प्रयत्न के
साथ आपत्तियों को दूर करने के लिए स्वयं ही मन को उन्नत बनायें । तीनों भुवनों के ऐश्वर्य से वह फल
प्राप्त नहीं हो सकता और रत्नों से भरे हुए कोश से भी वह फल प्राप्त नहीं हो सकता, जो फल तुच्छ
विषयों की अनिच्छा द्वारा उत्कर्ष को प्राप्त हुए मन से प्राप्त हो सकता हे । इस जगत के मध्य में
अधोगति, ऊर्ध्वगति और मनुष्यलोक में ही जन्मपरम्परा द्वारा भ्रमणों से जो पुरुष गिरते हैं, उनका मन
सदा ही संतप्त रहता है, कभी विश्रान्त नहीं होता