Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 21, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

प्रशमितसकलैषणो महात्मन्भव भवबन्धमपास्य मुक्तचित्तः । मनसि निगडरज्जवः कदाशाः परिगलितासु च तासु को न मुक्तः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त अर्थ का ही संग्रह करके उपसंहार करते है । हे महात्मन्‌, आप पुत्र, धन, लोक आदि की सम्पूर्णं एषणाओं का त्याग कर आशानामक संसार बन्धन को दूर कर जीवन्मुक्त होइये, क्योकि मन मेँ स्थित कुत्सित आशाएँ आत्मा की हथकड़ियाँ हैं, उनके नष्ट होने पर कौन मुक्त नहीं होगा यानी सभी मुक्त हो जाते हैं