Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 22, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथवा रघुवंशाख्यनभःपूर्णनिशाकर ।
बलिवद्बुद्धिभेदेन ज्ञानमासादयामलम् ॥ १ ॥
श्रीराम उवाच ।
भगवन्सर्वधर्मज्ञ त्वत्प्रसादान्मया हृदि ।
प्राप्तं प्राप्तव्यमखिलं विश्रान्तं चामले पदे ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
अब “पद्मक्षको त्रिजगत' इत्यादि से विवेक होने पर त्रैलोक्य का ऐश्वर्य भी अत्यल्प है, ऐसा जो
पहले कहा था, उसके उपपादन के लिए बलि का उपाख्यान कहने की इच्छा से भूमिका बधते है।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवंशरूपी आकाश के पूर्ण चन्द्र श्रीरामचन्द्रजी, अथवा आप अकस्मात
विचार के उदय से बलि के समान निर्मल ज्ञान प्राप्त कीजिये।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, हे सब धर्मो के ज्ञाता गुरुजी, आपके प्रसाद से मैंने पाने के योग्य
सर्वात्मक ब्रह्म को हृदय में प्राप्त कर लिया है और उसी निर्मल पद में मैंने विश्राम किया है
सर्ग सन्दर्भ
इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग बलि के आख्यान के सिलसिले में पाताल का वर्णन तथा बली के राज्य का और वैराग्य से मेरु के शिखर पर विचार का वर्णन ।