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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 21, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

एवं प्राग्भुक्तदेहानामनन्ता जनबन्धुता । आः कैः किं गृह्यते ताभ्यः किं वा संत्यज्यतेऽनघ ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त आख्यानका उपसंहार कर प्रस्तुत प्रसंग में उसकी योजना करते हैं। हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार पहले जन्मों में देहधारण कर चुके लोगों के मित्र, बन्धु ओर बान्धवों का समूह अनन्त है, भला बतलाइये तो सही, उनमें से कौन किसका ग्रहण करते हैं और कौन किसका त्याग करते हैं ?