Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 21, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
तस्मादासामनन्तानां तृष्णानां रघुनन्दन ।
उपायस्त्याग एवैको न नाम परिपालनम् ॥ ५ ॥
चिन्तनेनैधते चिन्ता त्विन्धनेनेव पावकः ।
नश्यत्यचिन्ततेनैव विनेन्धनमिवानलः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुनन्दन, इसलिए सब शोकों की मूलभूत, प्रत्येक विषय में अनन्त
तृष्णाओं का एक-मात्र त्याग ही उनकी निवृत्ति में उपाय हैं । विषयों के उपार्जन द्वारा उनका वर्धन
उपाय नहीं हे । जैसे लकड़ी से आग बढ़ती है वैसे वैसे ही चिन्तन से चिन्ता बढती है, जैसे लकड़ी के
बिना अग्नि बुझ जाती है वैसे ही चिन्तन के अभाव से वह नष्ट हो जाती है