Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 23, Verses 20–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 23, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
सुरासुरौघगृह्योऽपि गुणहीनोऽपि दुर्मतिः ।
दुराकृतिरपि क्रोधस्तत्प्रसादेन जृम्भते ॥ २० ॥
देवासुरसहस्राणां संगरो यः पुनः पुनः ।
तदेतत्क्रीडनं तस्य मन्त्रिणो मन्त्रशालिनः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
क्रोध ने यद्यपि सुर और असुरो के समूह को स्वतन्त्र नहीं छोड़ा, उसमें कोई गुण भी नहीं हैं आकृति
भी अच्छी नहीं है एवं बुद्धि भी उसकी अच्छी नहीं है, फिर भी वह उस मन्त्री के प्रसाद से समृद्ध हो रहा
है । हजारों देवता और असुरों का जो बार-बार युद्ध होता है, वह मन्त्र जाननेवाले उस मन्त्री के बाएँ
हाथ का खेल है