Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 23, Verses 22–24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 23, verses 22–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
स मन्त्री केवलं पुत्र तेनैव प्रभुणा यदि ।
जीयते तत्सुजेयोऽसावन्यथा त्वचलोपमः ॥ २२ ॥
तस्यैव तत्प्रभोः काले जेतुं तं मन्त्रिणं निजम् ।
इच्छा संजायते तेन जीयतेऽसावयत्नतः ॥ २३ ॥
त्रैलोक्यवलिनां मल्लमुच्छ्वासितजगत्त्रयम् ।
जेतुं चेदस्ति ते शक्तिस्तत्पराक्रमवानसि ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे पुत्र, उसी प्रभु द्वारा यदि वह मन्त्री जीता जाता है; तो सुजेय होता है।
अन्यथा तो वह पर्वत के समान अचल है। बहुत से पुण्यों के परिपाक से विवेक के उदय के समय में अपने
उस मन्त्री को जीतने की उसी प्रभु की यदि इच्छा होती है, तो यत्न के बिना उसके ऊपर विजय प्राप्त
होती है। तीनों लोकों में जितने बलवान हैं, उन्हें अपने बल से जीतनेवाले और तीनों लोकों को मर रहे
जन्तु के समान उच्छवासित कर देनेवाले उसे जीतने की यदि तुम में शक्ति है, तो तुम निश्चित
पराक्रमशाली हो