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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 3–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 24, verses 3–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 3-11

संस्कृत श्लोक

पुत्र युक्त्या गृहीतोऽसौ क्षणादायाति वश्यताम् । युक्तिं विना दहत्येष आशीविष इवोद्धतः ॥ ३ ॥ बालवल्लालयित्वैनं युक्त्या नियमयन्ति ये । राजानं तं समालोक्य पदमासादयन्ति ते ॥ ४ ॥ दृष्टे तस्मिन्महीपाले स मन्त्री वशमेति च । तस्मिंश्च मन्त्रिण्याक्रान्ते स राजा दृश्यते पुनः ॥ ५ ॥ यावन्न दृष्टो राजासौ तावन्मन्त्री न जीयते । मन्त्री च यावन्न जितस्तावद्राजा न दृश्यते ॥ ६ ॥ राजन्यदृष्टे दुर्मन्त्री स दुःखाय फलत्यति । मन्त्रिण्यनिर्जिते राजा सोऽत्यन्तं यात्यदृश्यताम् ॥ ७ ॥ अभ्यासेनोभयं तस्मात्सममेव समारभेत् । राजसंदर्शनं तस्य मन्त्रिणश्च पराजयम् ॥ ८ ॥ पौरुषेण प्रयत्नेन स्वभ्यासेन शनैःशनैः । द्वयं संपाद्य यत्नेन देशमाप्नोषि तं शुभम् ॥ ९ ॥ त्वमभ्यासे फलीभूते तं देशमभिगच्छसि । यदि दैत्येन्द्र तद्भूयो मनागपि न शोचसि ॥ १० ॥ संशान्तसकलायासा नित्यप्रमुदिताशयाः । साधवस्तत्र तिष्ठन्ति प्रशान्ताशेषसंशयाः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

का साक्षात्कार नहीं होता । राजा का साक्षात्कार न होने पर वह दुष्ट मन्त्री अत्यन्त दुःख के लिए राग- द्वेष आदि पैदा करता है ओर मन्त्री पर विजय न होने पर वह राजा सर्वथा अदुश्यता को प्राप्त हो जाता हे । इसलिए अभ्यास से राजदर्शन ओर मन्त्री पराजय इस दोनों का एक साथ आरम्भ करना चाहिये । पौरुष प्रयत्नरूप सुन्दर अभ्यास से धीरे-धीर उक्त दोनों का प्रयत्न से सम्पादन कर तुम उस शुभ मोक्षरूप देश को प्राप्त हो रहे हो । अभ्यास के सफल होने पर यदि तुम उस देश को प्राप्त होओगे, तो हे दैत्येन्द्र, तुम्हें फिर तनिक भी शोक नहीं रहेगा । जिन लोगों के सब आयास शान्त हो गये हैं जिनका आशय सदा के लिए प्रफुल्लित हो उठा हे ओर जिनके सब सन्देह शान्त हो चुके हैँ, एसे साधुजन उस शुभ देश में निवास करते हें