Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 24, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
संज्ञार्थं रूढनियतिशब्दः स्फुरति सानुवत् ।
तस्माद्यावन्मनस्तावन्न दैवं नियतिर्न च ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
कभी
(उत्थानकाल मेँ) शास्त्ररूप नियम से विहित वर्णाश्रमोचित कर्म करता हुआ, अज्ञानी लोगों के बोधन
के लिए “ये याज्ञिक एवं सदाचार के प्र्वतक है, इत्यादि रूप से लोक में प्रख्यात नियतिशब्द से युक्त
वह जैसे पर्वत का शिखर स्वयं निश्चल होता हुआ भी वायु के वेग से वृक्षों के चंचल होने पर चंचल-सा
ओर वृक्षों के स्थिर होने पर स्थिर-सा उदित होता है, वैसे ही नियति के अनुसार चंचल व स्थिर होता
हे