Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 24, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
प्रज्ञाविचारवशतः सममेव सदा सुत ।
आत्मावलोकनं तृष्णासंत्यागं च समाहरेत् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार का फल तृष्णा का आत्यन्तिक त्याग भी तभी होता है, इस आशय से कहते हैं।
हे पुत्र प्रज्ञा द्वारा विचार करने से आत्मदर्शन और तृष्णा का त्याग इन दोनों को एक ही काल
में करे