Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 53–54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 24, verses 53–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 53,54
संस्कृत श्लोक
परदृष्टौ वितृष्णत्वं तृष्णाभावे च दृक्परा ।
एते मिथः स्थिते दृष्टी तेजोदीपदशे यथा ॥ ५३ ॥
भोगपूगे गतास्वादे दृष्टे देवे परावरे ।
परे ब्रह्मणि विश्रान्तिरनन्तोदेति शाश्वती ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार का फल पुरुष अपराधनिवृत्ति और ज्ञान का फल मूल अविद्यानिवृत्ति पृथक् सिद्ध नहीं
होते, ऐसा कहते हैं।
परमात्मा का दर्शन होने पर निस्पृहता होती है और निस्पृहता होने पर परमात्म दर्शन होता है।
जैसे अग्नि की प्रभावस्था और दीपकारावस्था अन्धकार और तेल इन दोनों की निवर्तिका होकर परस्पर
एक काल में स्थित हैं वैसे ही ये दोनों दृष्टियाँ परस्पर एक काल में स्थित हैं । भोगों के समूह के रसरहित
होने पर और परमोत्कृष्ट परब्रह्म देव का दर्शन होने पर कभी नष्ट न होनेवाली असीम विश्रान्ति प्राप्त
होती है