Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verse 71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 24, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
देशक्रमेण धनमल्पविगर्हणेन तेनाङ्ग साधुजनमर्जय मानपूर्वम् ।
तत्संगमोत्थविषयाद्यवहेलनेन सम्यग्विचारविभवेन तवात्मलाभः ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त अर्थ का संक्षेप कर उपसंहार करते हैं।
देश और आचार से अविरुद्ध क्रम से धन का उपार्जन करो । उस धन से अत्यन्त तुच्छ भोग की
गर्हणा द्वारा यानी भोग के लिए धन व्यय न कर ब्रह्मवेत्ताजनों को नमस्कार से, अन्न-वस्त्रदान आदि
सम्मान द्वारा अपनी ओर आकृष्ट करो तदनन्तर सत्संगति से उत्पन्न हुए विषयों के अनादर से साधन
चतुष्टय सम्पत्ति से उत्पन्न अध्यात्मशास्त्र के सम्यक् विचार वैभव से तुम्हें आत्मलाभ कण्ठस्थित-
विस्मृत सुवर्ण के लाभ के समान होगा