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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 25, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

बलिरुवाच । एतन्मे कथितं पूर्वं पित्रा चारुविचारिणा । इदानीं संस्मृतं दिष्ट्या संप्रबोधमहं गतः ॥ १ ॥ अद्येयं मम संजाता भोगान्प्रत्यरतिः स्फुटम् । दिष्ट्या शमसुखं स्वच्छं विशाम्यमृतशीतलम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

बलि ने कहा : सुन्दर विचारवाले मेरे पिता ने यह पहले मुझसे कहा था। इस समय भाग्य से मुझे इसका स्मरण हो गया है; इससे मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ । आज मेरी भोगों के प्रति यह विरक्ति स्पष्टरूप से उत्पन्न हो गई है। बड़े हर्ष की बाता है कि मैं अमृत के समान शीतल, निर्मल शान्तिसुख में प्रविष्ट हूँ

सर्ग सन्दर्भ

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त प्रचीसवाँ सर्ग सन्देह की निवृत्ति के लिए शुक्राचार्य के चिन्तन की इच्छा से बलि के हृदय में विवेकरूपी चन्द्रमा के शुभोदय का वर्णन |