Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 26, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 26, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तत्र रत्नार्घ्यदानेन मन्दारकुसुमोत्करैः ।
पादाभिवन्दनैरेनं पूजयामास भार्गवम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर बलि ने रत्नमय
अर्घ्य के प्रदान से, मन्दार वृक्ष के फूलों की राशियों से ओर पादाभिवन्दन से शुक्राचार्यजी की पूजा की ।
बलि ने रत्नमय अर्घ्य से पूर्ण शरीरवाले, मन्दारपुष्पों के शिरोभूषण से विभूषित ओर बहुमूल्य आसन
पर बैठे हुए गुरु से कहा