Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 27, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
यथाभिमतमेवैते मत्तो न व्यतिरेकिणः ।
यदि स्वभावभूतेन वस्तुना वस्तु नीयते ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
इनसे परिच्छेद होने पर बाएँ हाथ में रखे गये धन का दाहिने हाथ से ले जाने, हरने अथवा
लौटाकर देने से दोनों हाथों से अभिन्न देहरूप देवदत्त की जैसे धन क्षति नहीं होती है वैसे ही मेरी
कोई क्षति नहीं है, ऐसा कहते हैं ।
यदि अपने स्वरूपभूत वस्तु-से-वस्तु ले जाई जाती है, हरी जाती है अथवा वापस लेकर दी
जाती है, तो किसका क्या नष्ट हुआ ?