Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 27, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
न शक्ता मां परिच्छेत्तुं भावाभावा जगद्गताः ।
अथ चैते जगद्भावाः परिच्छिन्दन्तु मामिमम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कहिये कि हम इयत्ता (सीमा) में स्थापन को परिच्छेद नहीं कहते हैं, किन्तु तत््वावधारण को
परिच्छेद कहते हैं, तत्त्वज्ञान के अनुकूल प्रमाण आदि जगत के भाव वास्तव में आत्मा का उक्त परिच्छेद
करते ही हैं, इस पर कहते हैं।
अथवा ये जगत के पदार्थ मुझे परिच्छिन्न करें, इस प्रकार का परिच्छेद मुञ्चे अभिमत ही है, किन्तु
इतने से ये मुझसे पृथक् नहीं हो सकते | मद्रूप ही हो जाते हैं, यह भाव है