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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verses 30–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 27, verses 30–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 30-35

संस्कृत श्लोक

चेत्यमस्म्यहमेवैतन्न किंचिदपि चोदितम् । किं संकल्पविकल्पाभ्यां चितं चिदियमेकिका ॥ ३० ॥ संक्षोभयाम्यहं तावच्छाम्याम्यात्मनि पावने । इति संचिन्तयन्नेव बलिः परमकोविदः ॥ ३१ ॥ ओंकारादर्धमात्रार्थं भावयन्मौनमास्थितः । संशान्तसर्वसंकल्पः प्रशान्तकलनागणः ॥ ३२ ॥ निःशङ्कमपि दूरास्तचेत्यचिन्तकचिन्तनः । ध्यातृध्येयध्यानहीनो निर्मलः शान्तवासनः ॥ ३३ ॥ बभूवावातदीपाभो बलिः प्राप्तमहापदः । उपशान्तमनास्तत्र रत्नवातायने बलिः । अवसद्बहुकालं स समुत्कीर्ण इवोपले ॥ ३४ ॥ प्रशमितैषणया परिपूर्णया मननदोषदशोज्झितयैतया । बलिरराजत निर्मलसत्तया विघनमच्छतयेव शरन्नभः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं एकमात्र यह चित्‌ हूँ, चिद्रूप मेरा संकल्प और विकल्प से क्या बढ़ा और क्या विनष्ट हुआ ? अपने अज्ञान से मेँ संक्षोभ को प्राप्त होता हूँ और तत्त्वज्ञान से पवित्र आत्मा में विश्रान्ति को प्राप्त होता हूँ। ऐसा विचार कर रहा परम ज्ञानी दैत्यराज बलि ओंकार से स्थूल और सूक्ष्म के संक्षोभ एवं उनके हेतुभूत अज्ञान से युक्त चैतन्य को बोधित कर रही अकार आदि तीन मात्राओं का त्यागकर तुरीय की आत्मरूप से भावना करता हुआ समाधिस्थ होकर स्थित रहा । उस महान पद को प्राप्त हुए बलि के सब संकल्प विलीन हो गये, सब कल्पनाएँ नष्ट हो गई, ध्याता, ध्येय और ध्यान से रहित होने के कारण उसने चेत्य, चिन्तक और चिन्तन का त्याग कर दिया । वह निर्मल और वासनाशून्य हो गया, इसलिए निर्वात स्थान में रक्खे हुए दीपक की प्रभा के समान निश्चल हो गया । शान्त मनवाला राजा बलि उस रत्ननिर्मित झरोखे पर पत्थर पर गढी हुई मूर्तिं के सदृश रहा । राजा बलि जिसने तीनों एषणाओं को शान्त कर दिया अतएव परिपूर्ण तथा विषयों के चिन्तनरूपी दोषदशा से शून्य इस निर्मल ब्रह्मभावप्राप्तिरूप सत्ता से ऐसे सुशोभित हुआ जैसे मेघरहित शरत्‌ कालीन आकाश निर्मलता से सुशोभित होता हे