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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 28, Verses 1–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 28, verses 1–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 1-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ ते दानवास्तत्र बलेरनुचरास्तदा । तद्गेहं स्फाटिकं सौधमुच्चैरारुरुहुः क्षणात् ॥ १ ॥ डिम्भाद्या मन्त्रिणो धीराः सामन्ताः कुमुदादयः । सुराद्याश्चैव राजानो वृत्ताद्या बलहारिणः ॥ २ ॥ हयग्रीवादयः सैन्याश्चाक्राजाद्याश्च बान्धवाः । लडुकाद्याश्च सुहृदो वलूकाद्याश्च लालकाः ॥ ३ ॥ कुबेरयमशक्राद्या उपायनकराः सुराः । यक्षविद्याधरा नागाः सेवावसरकाङ्क्षिणः ॥ ४ ॥ रम्भातिलोत्तमाद्याश्च चामरिण्यो वराङ्गनाः । सागराः सरितः शैला दिशश्च विदिशस्तथा ॥ ५ ॥ सेवार्थमाययुस्तस्य तं प्रदेशं तदा बलेः । अन्ये च बहवः सिद्धास्त्रेलोक्योदरवासिनः ॥ ६ ॥ ध्यानमौनसमाधिस्थं चित्रार्पितमिवाचलम् । नमत्किरीटावलयो ददृशुर्बलिमादृताः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर बलि के अनुचर वे दानव लोग स्फटिक के बने हुए बलि के निवासभूत ऊँचे राजमहल पर एक क्षण में चढ़ गये | वे अनुचर थे - डिम्ब आदि धीर मन्त्री, कुमुद आदि सामन्त, सुर आदि राजा, वृत्त आदि सेनापति, हयग्रीव आदि सैनिक, चाक्राज आदि बान्धव, लक आदि मित्र, बल्लुक आदि प्रीतिकारी, कुबेर, यम, इन्द्र आदि भेंट देनेवाले देवता, सेवा करने का अवसर चाहनेवाले यक्ष, विद्याधर और नाग, चँवर इलानेवाली रम्भा, तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ, सागर, नदियाँ, पर्व, दिशाएँ, विदिशाएँ (दिशा ओर विदिशाओं के देवता ओर उनमें अधिकारी रूप से नियुक्त लोग) उस समय बलि की सेवा के लिए उस स्थान पर आ पहुँचे । इनके अतिरिक्त त्रैलोक्य के मध्य में निवास करनेवाले बहुत से सिद्ध भी आए। सबने, जिनकी मुकुटो की पंक्तियाँ झुक रही थी, बड़े आदर के साथ बलि को, जो ध्यान ओर मोन से समाधि में बैठा था और चित्र में लिखित चित्र के समान निश्चल था, प्रणाम किया

सर्ग सन्दर्भ

सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त अद्भाईसवां सर्ग बलि को निश्चेष्ट देखकर दुःखित हुए दानवो द्वारा शुक्राचार्यजी का स्मरण और उनका बलि की स्थिति कहकर दानवों का शोक दूर करना ।