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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 30, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 30, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथेमं परमं राम विज्ञानाभिगमे क्रमम् । श्रृणु दैत्येश्वरः सिद्धः प्रह्रादः स्वात्मना यथा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार केवल काकतालीय न्याय से प्रवृत्त हुए तथा शास्त्र ओर आचार्य के उपदेश से परिपुष्ट अपने विचार से ज्ञानोदयके प्रकार का वर्णन करने के लिए प्रह्नादोपाख्यान कहने की इच्छावाले श्रीवसिष्ठजी उसके सुनने में रामचन्द्रजी को सावधान करते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञान की निर्विघ्न प्राप्ति में इस उत्तम प्रकार को आप सुनिये। जैसे कि दैत्यराज प्रह्लाद अपने-आप सिद्ध हो गया

सर्ग सन्दर्भ

उन्तीसर्वोँ सर्ग समाप्त तीसवाँ सर्ग हिरण्यकशिपु का पराक्रम, प्रह्लाद आदि पुत्रों की उत्पत्ति, नृसिंह द्वारा वध और शोकपूर्वक और्ध्वदैहिक क्रिया ।