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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 21–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 31, verses 21–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 21-24

संस्कृत श्लोक

पूर्वं यैरेव मत्तातश्चामरैरुपवीजितः । सहस्रनयनः स्वर्गे कष्टं तैरेव वीज्यते ॥ २१ ॥ इयमस्माकमप्यापदागता दैन्यदायिनी । तस्यैकस्य प्रसादेन दुष्पौरुषगतेर्हरेः ॥ २२ ॥ तद्दोर्वनघनच्छायालब्धविश्रान्तयः सुराः । न कदाचन तप्यन्ते हिमाद्रेरिव सानवः ॥ २३ ॥ शौरिशौर्याग्रशिखरसंश्रयेणाश्रितश्रियः । अस्मान्समुपरुन्धन्ति शुनः शाखामृगा इव ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले जो चवर मेरे पिता पर डुलाये गये थे, बड़े खेद की बात है, वे ही आज स्वर्ग में इन्द्र पर डुलाये जाते हैं। जिनका पराक्रम स्मरण भी दुःखदायी है, ऐसे उन एकमात्र भगवान श्रीहरि के प्रसाद से हम जैसे महाप्रतापशाली लोगों को भी ये आपत्तियाँ प्राप्त हैं। जैसे हिमालय के शिखर कभी सन्तप्त नहीं होते वैसे ही उन विष्णु भगवान की बाहुओं की निबिड छाया में विश्रान्त देवताओं को कभी सन्ताप प्राप्त नहीं होता । जैसे पर्वत या वृक्ष की चोटी पर बैठे हुए बन्दर बलवान कुत्तों को भी तंग करते हैं वैसे ही भगवान विष्णु के पराक्रमरूपी पर्वत या वृक्ष की चोटी के अवलम्बन से समृद्ध हुए देवता लोग हम बलवानों को भी पाताल में ढकेल रहे हैं