Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 27–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 31, verses 27–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 27-31
संस्कृत श्लोक
स धर्ता सुरसैन्यस्य मज्जतो विपदर्णवे ।
क्षीरोदोदरमग्नस्य मन्दरस्येव कच्छपः ॥ २७ ॥
एते तातादयः सर्वे तेनैवासुरसत्तमाः ।
पातिताः क्षुब्धकल्पान्तवातेनेव कुलाचलाः ॥ २८ ॥
स एक एव संहारकर्मक्षमभुजानलः ।
सुरसार्थगुरुः श्रीमान्विषमो मधुसूदनः ॥ २९ ॥
दैत्यदोर्दण्डपरशोस्तस्य वीर्येण वीर्यवान् ।
दानवान्बाधते शक्रो बालकानिव मर्कटः ॥ ३० ॥
दुर्जयः पुण्डरीकाक्षः प्रविमुक्तायुधोऽपि सन् ।
नासौ शस्त्रास्त्रविच्छेदैर्वज्रसारो विदीर्यते ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे क्षीर सागर के मध्य में डूबे हुए
मन्दराचल के धारणकर्ता कच्छप भगवान हैं वैसे ही विपत्तिरूप सागर में डूब रही देवसेना के वह भगवान
ही धारणकर्ता हैं। उन्होंने ये मेरे पिता आदि सब असुरश्रेष्ठ को ऐसे गिरा डाले जैसे कि क्षुब्ध हुआ
प्रलयकाल का वायु कुलाचलों को गिराता है । केवल एक उन्हीं भुजारूप अग्नि हम लोगों का संहार
करने में समर्थ हैं देवताओं के गुरु श्रीमान मधुसूदन हम लोगों के द्वारा आक्रान्त नहीं हो सकते । दैत्यों
के बाहुदण्ड के लिए कुठारभूत उन श्रीहरि भगवान के पराक्रम से पराक्रमशाली होकर इन्द्र जैसे बन्दर
बालकों को छेड़ता है वैसे ही दैत्यों को छेड़ रहा है। यदि भगवान शस्त्रारत्र का त्याग कर दें, तो भी उन
पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती । वज्र से भी कठिन वे शस्त्रास्त्रों के आघातों से छिन्न-भिन्न नहीं
किये जा सकते हैं