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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 57–61

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 31, verses 57–61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 57-61

संस्कृत श्लोक

इमान्यहमनन्तानि जगन्ति जठरे चिरम् । बिभर्मि जातनष्टानि वर्तमानान्यनेकशः ॥ ५७ ॥ इमौ मही मे चरणाविदं मे गगनं शिरः । इदं वपुर्मे त्रिजगदिमे मे कुक्षयो दिशः ॥ ५८ ॥ साक्षादयमहं विष्णुर्नीलमेघोदरद्युतिः । सुपर्णपर्वतारूढः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ५९ ॥ एते मत्तः पलायन्ते समग्रा दुष्टचेतसः । तार्णास्तरलसंचाराः पवनादिव राशयः ॥ ६० ॥ अयं नीलोत्पलश्यामः पीतवासा गदाधरः । लक्ष्मीवान्गरुडारूढः स्वयमेवाहमच्युतः ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं उत्पन्न होकर नष्ट हुए अतीत ओर वर्तमान इस अनेक जगतो को अपने उदर में चिरकाल तक धारण करता हूँ। पृथिवी मेरे चरण है, आकाश मेरा सिर है, तीनों जगत मेरे शरीर है, दिशाएँ मेरे उदर है । मे नील मेघ के मध्य के समान श्यामल कान्तिवाला, गरुड़रूपी पर्वत पर आरूढ तथा शंख-चक्र- गदाधारी साक्षात्‌ विष्णु हूँ। ये सब दुष्ट चित्तवाले जीव जैसे चंचल तृणराशियाँ वायु से उडती हैं वैसे ही मुझसे भाग रहे हैँ । यह नील कमल के समान श्यामल कान्तिवाला, पीताम्बरघारी, हाथ में गदा लिया हुआ, गरुड़ पर आरूढ और लक्ष्मीयुक्त मै स्वयं ही अच्युत हो गया हू