Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 55–56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 31, verses 55–56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 55,56
संस्कृत श्लोक
अयं मे केतुमद्वह्निसुन्दरो ज्वलितोऽसितः ।
कुठारो दैत्यवृक्षाणां नन्दयन्नन्दकः स्थितः ॥ ५५ ॥
इदं मे शरधाराणां पुष्करावर्तकोपमम् ।
शार्ङ्गं धनुरहीन्द्राभमिन्द्रकार्मुकसुन्दरम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
धूम्रयुक्त अग्नि के समान सुन्दर काला ओर चमकीला मेरा अन्दकनामक खड्ग है । यह दैत्यरूपी वृक्षों
के लिए कुठारभूत है और देवताओं को आनन्द देनेवाला हे । यह बाणरूपी वृष्टिधाराओं को वषनि में
पुष्करावर्तं मेच के तुल्य ओर शेषनाग के सदुश विशाल शारंग नामक धनुष हे, जो विविध मणियों से
विचित्र होने के कारण इन्द्रधनुष के समान सुन्दर हे