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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 33, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । गर्जन्तमतिसंरब्धं सुरलोकमथारिहा । उवाच माधवो वाक्यं शिखिवृन्दमिवाम्बुदः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । विबुधा मा विषण्णाः स्थ प्रह्लादो भक्तिमानिति । पाश्चात्यं जन्म तस्येदं मोक्षार्होऽसावरिंदमः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

बत्तीसवाँ सर्गे समाप्त तेंतीसवाँ सर्ग हरिभक्ति से प्रह्नाद के विवेक आदि गुणों का उदय और प्रसन्न हुए हरि को अपने आगे देखकर स्तुति । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अनुचित देखने से कुपित हुए अतएव पूर्वोक्त रीति से जोर से चिल्लाकर पूछ रहे देववृन्द से शत्रुओं का विनाश करनेवाले भगवान जैसे मयूरो के झुण्ड से बादल बोलता हे वैसे ही निम्न निर्दिष्ट वाक्य बोले । श्रीभगवान ने कहा : हे देववृन्द, प्रह्लाद भक्तिमान हो गया है, यह जान कर आप लोग दुःखी न हो । यदि कहो कि पहले दैत्य स्वतः ही बलवान हैं, आपकी भक्ति से और बलवान हो जायेंगे, अत: हम विषाद क्यों न करे, तो आपका यह तर्कं ठीक नहीं है, कारण कि शत्रुतापन प्रह्लाद मोक्ष योग्य है, अतएव आप लोगों के समान तुच्छ राज्य सुख को वह नहीं चाहता हे । उसका यह अन्तिम जन्म है