Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 102
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verse 102 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 102
संस्कृत श्लोक
भवत्यात्मा तथा ब्रह्म न किंचिच्चाखिलं च वा ।
परमोपशमेऽलीना मोक्षनाम्ना परोच्यते ॥ १०२ ॥
हिन्दी अर्थ
जो (चित्) स्थित है वह शास्त्रीय
व्यवहार में प्रत्यक् होने के कारण आत्मा है तथा बृहत् होने से ब्रह्म है, परमार्थ दृष्टि से तो उसमें
वाणियों की प्रवृत्ति का अभाव होने से कुछ भी नहीं है। यदि प्रवृत्ति निमित्त की कल्पना से शब्द प्रवृत्ति
कही जाय, तो संकोच हेतु का अभाव होने से सब प्रवृत्ति निमित्तं की कल्पना होने से वह सब है,
क्योंकि “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” ओर “स्मात् तत्सर्वम भवत्" इस श्रुति में दोनों प्रकारों
का निरूपण है। सब दृश्यों का परम उपशम होने पर उनकी अवधि होने से लय को प्राप्त न हुई वह चिति
परम समता “मोक्ष' नाम से कही जाती है