Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 103–104
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 103–104 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 103 ,104
संस्कृत श्लोक
संकल्पकलिता त्वेषा मन्दाभासतया जगत् ।
न सम्यक्पश्यतीदं चिदृष्टिः पटलिनी यथा ॥ १०३ ॥
ईहानीहामयैरन्तर्या चिदावलिता मलैः ।
सा हि नोड्डयितुं शक्ता पाशबद्धेव पक्षिणी ॥ १०४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार भेदसंकल्प की कल्पना का त्याग उपायपूर्वक कहा। एवं कल्प की कल्पना में चिति की
मन्दता के प्रसार के क्रम को कहते हैं।
संकल्प से कल्पित तो यह चिति पटलरूप आवरण से युक्त दृष्टि के समान मन्दाभास (मन्दप्रकाश)
होने के कारण इस जगत् को परमार्थरूप से नहीं देखती हे । जो चिति इष्ट-अनिष्ट संकल्परूप मलो से
भीतर ओतप्रोत है वह जैसे जाल में बँधी हुई चिड़िया आकाशमार्ग से उड़ने में समर्थ नहीं होती वैसे ही
सारे आकाश को व्याप्त करने में समर्थ नहीं होती है