Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 105–110
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 105–110 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 105-110
संस्कृत श्लोक
संकल्पकलनेनैव ये केचन जना इमे ।
पतिता मोहजालेषु विनेत्रा इव पक्षिणः ॥ १०५ ॥
संकल्पजालवलितैर्विषयावटपातिभिः ।
पदवी गतबाधेयं न दृष्टा मत्पितामहैः ॥ १०६ ॥
दिनैः कतिपयैरेव स्फुरिता धरणीतले ।
वराकास्तेन ते नष्टा मशकाः कुहरेष्विव ॥ १०७ ॥
यद्यज्ञास्यन्निमे तत्त्वं भोगदुःखार्थिनस्तदा ।
भावाभावान्धकूपेषु नापतिष्यन्हताशयाः ॥ १०८ ॥
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन जन्तवः ।
धराविवरमग्नानां कीटानां समतां गताः ॥ १०९ ॥
ईहितानीहिताकाराः कलनामृगतृष्णिकाः ।
सत्यावबोधमेधेन यस्य शान्ताः स जीवति ॥ ११० ॥
हिन्दी अर्थ
गिरते | सब जीव इच्छाद्वेष से उत्पन्न द्वन्द मोह से यानी सुखदुःख, शीत-उष्ण आदि के उपार्जन
ओर प्रतीकार के अभिनिवेश से छिद्र में छिपे हुए कीड़ों के तुल्य हो गये हें । जिसकी इष्ट और
अनिष्टकल्पनारूपी मृगतृष्णा सत्यज्ञानरूपी मेघ से द्रन्द्रताप की शान्ति द्वारा) शान्त हो चुकी हे,
उसका जीवन सार्थक हे