Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 113–115
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 113–115 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 113-115
संस्कृत श्लोक
परामृष्टोऽसि लब्धोऽसि प्रोदितोऽसि चिराय च ।
उद्धृतोसिविकल्पेभ्यो योसि सोसि नमोस्तु ते ॥ ११३ ॥
मह्यं तुभ्यमनन्ताय मह्यं तुभ्यं शिवात्मने ।
नमो देवाधिदेवाय पराय परमात्मने ॥ ११४ ॥
गतघनपरिपूर्णमिन्दुबिम्बं गतकलनावरणं स्वमेव रूपम् ।
स्ववषुषि मुदिते स्वयं स्वसंस्थं स्वयमुदितं स्ववशं स्वयं नमामि ॥ ११५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भगवन्, चिरकाल तक मैंने आपका विचार किया है,
आपको प्राप्त किया है, अपने पारमार्थिकरूप से अभिव्यक्त किया हे ओर विकल्पों से आपका उद्धार
किया है, आप जो है वह है आपको नमस्कार है । मुझ रूप आप अनन्त को, मुझरूप आप
शिवदेवाधिदेवपरम परमात्मा को नमस्कार है । मेघरूपी आवरण से शून्य परिपूर्ण चन्द्रबिम्ब के तुल्य
कलनारूपी आवरण से रहित अपने ही रूप को, जो आनन्दैकरस स्वात्मा में स्वयं (अन्य किसी
आधार के बिना) अपने पारमार्थिकरूप से स्थित, स्वप्रकाश स्वाधीन आनन्दवाला हे, अभिन्नरूप
मैं प्रणाम करता हू