Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

प्रह्लाद उवाच । ओमित्येकोचिताकारो विकारपरिवर्जितः । आत्मैवायमिदं सर्वं यत्किंचिज्जगतीगतम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रह्नमाद ने कहा : ओमिति ब्रह्म (ॐ ब्रह्म है), ओमितीदं सर्वम्‌ (ॐ यह सब है)। एतद्रे सत्यकाम परमचापरं च ब्रह्म यदोंकार:' (हे सत्यकाम, यह पर और अपर ब्रह्म है, जो यह ओंकार है ।) इत्यादि श्रुतियों से सबके अध्यारोपवाले ब्रह्म का बोधक और सबके अपवाद से परिशिष्ट ब्रह्म का बोधक ॐ“ ही जिसका स्वानुरूप अभिधान है ओर विकारों से रहित यह आत्मा ही जो कुछ इस जगतीतल में स्थित है वह सब कुछ है

सर्ग सन्दर्भ

चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतीसवाँ सर्ग साक्षात्कृत आत्मा का मन में विचारकर और प्रणाम कर उसके बल से जीते गये बन्धनों का अनुसन्धान कर प्रह्लाद का प्रसन्न होना ।