Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
मेदोस्थिमांसमज्जासृगतीतोऽप्येष चेतनः ।
अन्तरस्थो हि सूर्यादीन्प्रकाशयति दीपकः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यह आत्मा एकमात्र देह के अन्तर्गत है, यह बाह्य सूर्य आदि सब कुछ कैसे हो सकता है ? ऐसी यदि
कोई शंका करे, तो सूर्य आदि बाह्यपदार्थो का प्रकाशक होने से, ऐसा कहते है।
यह चेतन मेदा, अस्थि, मांस, मज्जा ओर रक्त आदि रूप देहपरिमित नहीं है, किन्तु उससे
अतीत है । सूर्य आदि के अन्दर स्थित दीपकरूप यह सूर्य आदि को प्रकाशित करता हे