Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
उष्णीकरोति दहनं रसयत्यमृतं रसम् ।
इन्द्रियानुभवान्भुङ्कते भोगानिवमहीपतिः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल उस्ने प्रकाश्य होने के कारण सब कुछ तदात्म कैसे है ? ऐसी यदि किसी को शंका हो, तो
उस पर कहते है ।
चूँकि अग्नि आदि की उष्णस्वभावता चित् के अधीन उष्णता के भान के अधीन है, इसलिए
चिदात्मा ही स्वसत्ता से अग्नि को उष्ण करता है एवं जल को, जो अपनी सत्ता से ही सत्तावाला है,
रसरूप से प्रगट करता है। इसी प्रकार जैसे राजा भोगों को भोगते हैं वैसे ही वह अन्यान्य इन्द्रियानुभावों
का भोग करता है