Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
तिष्ठन्नपि हि नासीनो गच्छन्नपि न गच्छति ।
शान्तोऽपि व्यवहारस्थः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
सदा निष्क्रिय रहता भी वह बैठे हुए की तरह गति आदि व्यापार से विरत
नहीं है, क्योकि वायु और सूर्य रूप से सदा गतियुक्त है । कालरूप से सदा चलता हुआ भी कुलाल
के चक्र के समान एक तिल भर भी इधर-उधर नहीं जाता, व्यवहार रहित होने पर भी सब व्यवहार
में स्थित है, कर्म करता हुआ भी उनके फल से लिप्त नहीं होता ।
(यदि कोई शंका करे कि पूर्वजन्म के कर्मो से इस समय सुख-दुःख से लिप्त होता है और इस
समय यहाँ पर किये गये कर्म से परलोक में खुख-दुःख से लिप्त होगा)