Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
अनेनैताः स्फुरन्तीह विचित्रेन्द्रियवृत्तयः ।
तेजसान्तःप्रकाशेन यथाग्निकणपङ्क्तयः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भीतर प्रकाशमान तेजरूप
इसी से इन विचित्र इन्द्रियवृत्तियों का स्फुरण होता है जो कि भीतर प्रकाशमान तेज से अग्निभूत
अंगारकण पंक्तियों का स्फुरण होता है