Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अनेनैताः स्फुरन्तीह विचित्रेन्द्रियपङ्क्तयः ।
सर्वगेन निदाघेन यथा मरुमरीचिकाः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे ग्रीष्म ऋ्तु से मरुमरीचिकाओं का (मृगतृष्णाओं
का) स्फुरण होता है वैसे ही सर्वव्यापक इस चेतन से ये विचित्र इन्द्रिय पंक्तियाँ स्फुरित होती है