Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 45–46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 45–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 45,46
संस्कृत श्लोक
अहं त्रिनेत्रयाऽऽकृत्या गौरीवक्त्राब्जषट्पदः ।
सर्गान्ते संहरामीदं कूर्मोऽङ्गपटलं यथा ॥ ४५ ॥
अहमिन्द्रेण रूपेण त्रिलोकीमखिलामिमाम् ।
पालयामि क्रमप्राप्तां मठिकामिव तापसः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं तीन नेत्रवाली
आकृति से श्रीपार्वतीजी के मुखकमल का भ्रमर बनकर जैसे कछुआ अपने अंगो को समेट लेता हे वैसे
ही इस जगत् का प्रलयकाल में संहार करता हू । जैसे तपस्वी गुरुपरम्परा प्राप्त अपने मठ की रक्षा
करता है वैसे ही इन्द्ररूप से मैं मन्वन्तरक्रम से प्राप्त हुए इस सारे त्रिलोक का पालन करता हूँ