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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 52–58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 52–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 52-58

संस्कृत श्लोक

कुसुमेष्वहमामोदः पुष्पपत्रेष्वहं छविः । छविष्वहं रूपकला रूपेष्वनुभवोऽप्यहम् ॥ ५२ ॥ यद्यत्किंचिदिदं दृश्यं जगत्स्थावरजङ्गमम् । सर्वसंकल्परहितं तच्चित्तत्त्वमहं परम् ॥ ५३ ॥ आद्या रसमयी शक्ती रसौघो विस्तृतो यया । सा यथा दारुकुड्येषु तथाहं सर्ववस्तुषु ॥ ५४ ॥ परमां तामहं सर्वपदार्थान्तरवर्तिताम् । उपेत्य संविद्वैचित्र्यं प्रतनोमि स्वयेच्छया ॥ ५५ ॥ घृतं यथान्तः पयसो रसशक्तिर्यथा जले । चिच्छक्तिः सर्वभावेषु तथान्तरहमास्थितः ॥ ५६ ॥ इदं जगत्त्रिकालस्थं चिति मध्ये च संस्थितम् । चेत्योपचाररहितं वस्तुजातमिवावनौ ॥ ५७ ॥ भरिताशेषदिक्कुक्षिस्त्यक्तसंकोचविभ्रमः । सर्वस्थः सर्वकर्ता च विराट् सम्राडहं स्थितः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

अब इश्वरूप अपने विभूति विस्तार का वर्णन करते हैं। मैं फूलों मे सुगन्ध हूँ, फूलों की पंखुड़ियों में मैं कान्ति हूँ । कान्तियो में रूपकला हूँ और रूपों मे भी मैं अनुभव हूँ। चराचर जगद्रूप में कुछ यह दृश्य है, वह सब सर्व संकल्प रहित परम चिदात्मतत्त्व मैं ही हूँ। रसमयी आदि शक्ति यानी रस तन्मात्रा जिससे सागर, नदी, तालाब, कूप आदि जलाशय विस्तृत है, वही जलभूत शक्ति जैसे वृक्षं मे शाखा, पल्लव आदि की उत्पत्ति मेँ हेतुरूप से और दीवारों मे इनके, जौ के अंकुर आदिकी उत्पत्ति में हेतुरूप से फैली है वैसे ही मेँ सब वस्तुओं में तत्‌ तत्‌ कार्यो की उत्पत्ति में हेतुरूप से फैला हूँ। मैं अपनी इच्छा से सब पदार्थो की उस परम अन्तर्यामिता को प्राप्त करके ज्ञान वैचित्र्य का विस्तार करता हूँ। जैसे दूध के अन्दर घी रहता है और जल के अन्दर रसशक्ति रहती है वैसे ही चित्‌शक्तिरूप मैं सब पदार्थो में स्थित हूँ। जैसे तृण, काष्ठ, लोष्ठ आदि वस्तुएँ पृथ्वी पर स्थित हैं वैसे ही अतीत, वर्तमान और भविष्य यह जड़ जगत्‌ चिद्रूप मुझमें व्यवस्थित है । सब दिशाओं के मध्य को जिसने पूर्ण कर रक्खा है, संकोचभ्रम का जिसने त्याग कर दिया है, सबमें स्थित सबका रचयिता ओर व्यष्टिभेद से शोभित होने वाला एवं समष्टि रूप से शोभित होनेवाला मैं हूँ