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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 95

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verse 95 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 95

संस्कृत श्लोक

परामृष्टत्रिकालाया दृष्टानन्तदृशश्चितः । समतापरपर्याया पूर्णतैवावशिष्यते ॥ ९५ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव कालभेद और वृत्तिभेद होने पर उसके साक्षी चैतन्य का भेद नहीं है, इसलिए उसमें पूर्णता ही है, ऐसा कहते है। चैतन्य की, जिसे तीनों कालों का परिज्ञान है और जिसमें अनन्त वृत्तियाँ देखी गई हैं, पूर्णता ही, जिसका दूसरा नाम समता है, अवशिष्ट रहती है