Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अनाक्रुष्टोऽप्यनाहूतः स्वदेहादेव लभ्यते ।
मनागेवोपहूतोऽपि क्षणाद्भवति सन्मुखः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
दुरदेशवर्ती मित्र आदि का जोर से चिल्लाकर पुकारने से ओर
नजदीक में स्थित मित्र का केवल पुकारनेमात्र से लाभ हो जाता है। किन्तु यह तो बिना जोर से पुकारे
अपने शरीर से ही प्राप्त हो जाता है तथा केवल प्रणव के उच्चारण से थोड़ा स्मरण करने पर क्षणभर में
सन्मुख हो जाता है