Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 9–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
अतिदुर्विधवद्देहगेहे कर्मरतः सदा ।
सम्राडिवात्मनि स्वस्थः संस्थितो भोगभुग्विभुः ॥ ९ ॥
एष एव सदाऽन्विष्यः स्तुत्यो ध्यातव्य एव तु ।
जरामरणसंमोहादनेनोत्तीर्य गम्यते ॥ १० ॥
सुलभश्चायमत्यन्तं सुजेयश्चाप्तबन्धुवत् ।
शरीरपद्मकुहरे सर्वेषामेव षट्पदः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
भोगों
का भोग करनेवाले विभु आत्मा सम्राट् के समान अपना आत्मा में स्वस्थ होकर स्थित होता हुआ भी
अतिदुर्दशाग्रस्त पुरुष के समान देहरूपी घर में सदा कर्मनिरत रहता हे । इसीका सदा अन्वेषण करना
चाहिये, इसीकी स्तुति करना चाहिये ओर इसीका ध्यान करना चाहिये । खोजे गये इसीसे पुरुष
जरामरणरूपी संसार से पार होकर परमपद को प्राप्त होता है । सभीके शरीररूपी पद्मगर्भ में भ्रमररूप
यह केवल ज्ञान से प्रप्त होने के कारण अत्यन्त सुलभ हे । अत्यन्त आप्त बन्धु के समान केवल स्मरणमात्र
से ही वश में हो जाता है