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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 17–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

अस्मिन्दृष्टे परे बन्धावुद्दामानन्ददायिनि । आयान्ति दृष्टयस्तास्ता याभिर्भङ्गो विलीयते ॥ १७ ॥ त्रुट्यन्ते सर्वतः पाशाः क्षीयन्ते सर्वशत्रवः । न कृन्तन्ति मनांस्याशा गृहाणीव दुराखवः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

अतिशय आनन्द देनेवाले इस परमात्मरूप परम बन्धु के दर्शन होने पर वे दृष्टियाँ प्राप्त होती है, जिनसे मरणादि विच्छेद नहीं होता सब ओर से स्नेह आदि पाश टूट जाता हैं, काम आदि सब शत्रु नष्ट हो जाते हैं ओर तृष्णाएँ जैसे दुष्ट चूहे घरों को छिन्न-भिन्न करते हैं वैसे मन को छिन्न-भिन्न नहीं करती