Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 27–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
यथा सर्वगता सत्ता कालः सर्वगतो यथा ।
प्रभुशक्तिर्मही यस्य सर्वदेशगता यथा ॥ २७ ॥
रूपालोकमनस्कारयुक्तं सत्त्वं तथात्मनः ।
नित्यः सोऽयं महादेवो देवानामेव बोधकः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसकी मन, इन्द्रिय आदि से व्यावृत्त सर्वक्षेत्र साधारण प्रकाशता को ही दिखलाते है ।
जैसे सत्ता सर्वगत हे, जैसे काल सर्वगत है ओर जैसे राजा की प्रभुशक्ति स्वदिश में व्याप्त होती है
वैसे ही नेत्र आदि के व्यापारों और मानसिक व्यापारों से युक्त जो बाहरी और भीतरी प्रकाश है, वह
आत्मा का ही कार्य है यानी वह प्रकाशैकस्वभाव है । इसी प्रकार सूर्य-चन्द्रादि सब देवताओं का भी
बोधक यह प्रसिद्ध महादेव मैं ही हूँ। मेरी दूसरी कल्पना ही नहीं है