Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
तुम्बकोपरि धाराश्च का नः क्षतिरुपस्थिता ।
दीपाङ्गातिगतो रज्वा नालोको बध्यते यथा ॥ ३१ ॥
तथा नायमहं बद्धः सर्वभावगणातिगः ।
संबन्धः कोऽस्तु नः कामैर्भावाभावैरथेन्द्रियैः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
दीपक के अंगभूत तेल, बत्ती, बर्तन आदि का अतिक्रमण करके निकला हुआ
दीप प्रकाश जैसे रस्सी से नहीं बोधा जाता वैसे ही सब पदार्थों से अतीत मैं बद्ध नहीं होता हू । काम,
भाव, अभाव ओर इन्द्रियों से हमारा क्या सम्बन्ध है ? भला बतलाइये तो सही आकाश किससे बोधा
जाता है ओर मन किससे विनष्ट किया जाता हे । भाव यह कि अमूर्त होने से जैसे आकाश का बाँधना
सम्भव नहीं हे, मन का ताडन सम्भव नहीं हे वैसे ही काम, भाव, अभाव ओर इन्द्रियों से हमारा कोई
सम्बंध नहीं है