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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 22–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 36, verses 22–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 22-24

संस्कृत श्लोक

त्वया विमलदीपेन भानुः प्रकटतां गतः । त्वया शीततुषारेण चन्द्रः शिशिरतां गतः ॥ २२ ॥ त्वयैते गुरवः शैलास्त्वयैते द्युचरा धृताः । त्वयैवेयं धरा धीरा त्वयैवाम्बरमम्बरम् ॥ २३ ॥ दिष्ट्या मत्तामसि प्राप्तो दिष्ट्या त्वत्तामहं गतः । अहं त्वं त्वमहं देव दिष्ट्या भेदोऽस्ति नावयोः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः“ इस श्रुति के अनुसार भी कहते है । निर्मल दीपरूप तुमसे सूर्य प्रकाशता को प्राप्त हुआ हे, शीतल हिमरूप तुमसे चन्द्रमा शीतलता को प्राप्त हुआ है, ये पर्वत तुम्हारे द्वारा ही गुरु (भारयुक्त) किये गये हैं, ये वायु आदि आकाशचारी तुमसे धारण किया गया है, यह पृथिवी तुम्हारे द्वारा ही अचल है और यह आकाश तुम्हारे द्वारा ही अवकाश देनेवाला हे । बड़े भाग्य की बात हे तुम मत्स्वरूपता को प्राप्त हो गये हो और भाग्य से मैं त्वत्स्वरूपता को प्राप्त हो गया हूँ। हे देव, मैं तुम हूँ और तुम मैं हो । बड़े भाग्य की बात है हम लोगों का भेद नहीं रहा