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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 36, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

मय्यात्मनि समे स्वच्छे साक्षिभूते निराकृतौ । दिक्कालाद्यनवच्छिन्ने स्वात्मन्येवेह तिष्ठसि ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

सम, निर्मल निराकार साक्षिभूत, दिशा काल आदि से अनवच्छिन्न स्वात्मरूप मुझ प्रत्यक्स्वभाव में ही आप रहते हैं कभी भी पराकृस्वभाव में नहीं रहते