Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 37, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 37, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
न प्रापुर्विकसद्रूपं पतिं तममरारयः ।
लसत्पत्रलताजालं निशि पद्ममिवालयः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे रात्रि मेँ भ्रमर जिसकी
पंखुड़ियाँ विकसित हो रही हों ऐसे कमल को नहीं पा सकते वैसे ही असुरो ने उस स्वामी को समाधि से
बोध-युक्त नहीं पाया